दिल्ली में NEET परीक्षा को लेकर चला CJP (कॉकरोच जनता पार्टी) का 36 दिनों का आंदोलन भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन उसके बाद देशभर में विरोध प्रदर्शनों की नई लहर देखने को मिल रही है। CJP आंदोलन की सफलता ने अलग-अलग वर्गों को यह भरोसा दिया है कि संगठित होकर अपनी मांगों के लिए आवाज उठाई जाए तो सरकार पर दबाव बनाया जा सकता है। यही वजह है कि अब किसान, पर्यावरण कार्यकर्ता और स्थानीय संगठन अपने-अपने मुद्दों को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। मध्य प्रदेश से लेकर उत्तराखंड, गुजरात, पंजाब और मणिपुर तक कई राज्यों में आंदोलन तेज हो गए हैं।
सबसे बड़ा आंदोलन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में देखने को मिल रहा है, जहां करीब दो हजार किसान नर्मदापुरम रोड पर डेरा डाले हुए हैं। किसानों की मुख्य मांग मूंग की 100 प्रतिशत सरकारी खरीद और खाद वितरण व्यवस्था में सुधार है। प्रशासन और किसानों के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन कोई समाधान नहीं निकल सका। प्रशासन ने आंदोलन समाप्त करने के लिए एक सप्ताह का समय मांगा, जिसे किसानों ने अस्वीकार कर दिया। किसानों ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। प्रदर्शन का असर राजधानी के यातायात और स्कूलों पर भी पड़ा है। कई प्रमुख मार्गों पर जाम की स्थिति बनी हुई है और कुछ स्कूलों में छुट्टी तक घोषित करनी पड़ी।
उत्तराखंड में सड़क चौड़ीकरण परियोजना के विरोध ने ऐतिहासिक चिपको आंदोलन की यादें ताजा कर दी हैं। शिवालिक क्षेत्र में स्थानीय लोग, छात्र और पर्यावरण कार्यकर्ता पेड़ों से चिपककर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि परियोजना के तहत हाथी कॉरिडोर वाले क्षेत्र में हजारों पेड़ काटे जाएंगे, जिससे वन्यजीवों और पर्यावरण को गंभीर नुकसान होगा। भनियावाला-ऋषिकेश मार्ग पर 4,369 पेड़ काटने और 754 पेड़ों को स्थानांतरित करने का प्रस्ताव है। हालांकि प्रशासन सुरक्षा व्यवस्था के बीच परियोजना का काम जारी रखे हुए है, लेकिन आंदोलन लगातार तेज होता जा रहा है।
गुजरात के मोरबी जिले में भी किसान लंबे समय से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं। उनकी मांग है कि बिजली ट्रांसमिशन लाइन और टावरों के लिए इस्तेमाल की जा रही कृषि भूमि का मुआवजा बाजार मूल्य के बराबर दिया जाए। प्रदर्शन में बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल हैं और कई लोगों की तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें चिकित्सीय सहायता की जरूरत पड़ रही है। राज्य सरकार ने मुआवजे में बढ़ोतरी की घोषणा की है, लेकिन किसान अभी भी अपनी मूल मांग पर कायम हैं। इस आंदोलन को स्थानीय पंचायतों और कई जनप्रतिनिधियों का भी समर्थन मिल रहा है।
पंजाब में किसानों का विरोध प्रदर्शन दो अलग-अलग मुद्दों पर केंद्रित है। एक ओर वे न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का विरोध भी कर रहे हैं। भारतीय किसान यूनियन और संयुक्त किसान मोर्चा ने राज्य के कई टोल प्लाजा पर प्रदर्शन की घोषणा की है। लुधियाना के लाडोवाल टोल प्लाजा को कुछ घंटों के लिए टोल फ्री करने का फैसला भी इसी आंदोलन का हिस्सा है। शंभू सीमा पर भी किसान डटे हुए हैं और दिल्ली कूच की तैयारी जारी है।
पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में हालात अलग वजहों से तनावपूर्ण बने हुए हैं। बिष्णुपुर जिले में हुए विस्फोट में दो बच्चों की मौत के बाद लोगों में भारी आक्रोश है। कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, जबकि प्रशासन ने कर्फ्यू लागू कर इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी हैं। इससे पहले भी राज्य में जातीय हिंसा और अपहरण की घटनाओं के बाद कई संगठनों ने बंद और विरोध प्रदर्शन किए थे। मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच जारी तनाव ने राज्य की स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है।
इन बड़े आंदोलनों के अलावा मध्य प्रदेश के छतरपुर में केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के खिलाफ भी ग्रामीण प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका आरोप है कि पुनर्वास और मुआवजे की प्रक्रिया पूरी किए बिना ही परियोजना पर काम शुरू कर दिया गया। वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर, हापुड़, बागपत, मेरठ और बरेली में हजारों किसानों ने प्रदर्शन कर MSP की कानूनी गारंटी, गन्ना भुगतान, DAP की कालाबाजारी पर रोक और व्यापार समझौते को वापस लेने जैसी मांगें उठाईं।
देशभर में उभर रहे ये आंदोलन अलग-अलग मुद्दों पर आधारित जरूर हैं, लेकिन इन सभी में एक समानता दिखाई दे रही है—संगठित होकर अपनी मांगों के लिए संघर्ष करने का संदेश। दिल्ली का CJP आंदोलन समाप्त होने के बाद अब कई राज्यों में लोग अपने अधिकारों और स्थानीय मुद्दों को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं। आने वाले दिनों में सरकार इन आंदोलनों से कैसे निपटती है और क्या इन मांगों पर कोई ठोस समाधान निकलता है, इस पर पूरे देश की नजर बनी रहेगी।