उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों की ओर से पिछले कुछ महीनों में दर्ज की गई आपत्तियों से जुड़ी रिपोर्ट सामने आने के बाद समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं।
अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि पिछले 10 महीनों में दो चुनाव आयुक्तों ने आयोग के फैसलों पर 14 बार आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने इसे गंभीर स्थिति बताते हुए कहा कि अगर किसी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के सदस्यों को अपनी राय रखने की स्वतंत्रता नहीं है या उनकी बात नहीं सुनी जाती, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।
सपा प्रमुख ने सुप्रीम कोर्ट से मामले पर स्वत: संज्ञान लेने की अपील भी की। उन्होंने SIR के तहत मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने को लेकर भी सवाल उठाए और इसे आगामी चुनावों के संदर्भ में महत्वपूर्ण मुद्दा बताया।
14 आपत्तियों की रिपोर्ट में क्या कहा गया?
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में अलग-अलग मामलों को लेकर 14 औपचारिक आपत्तियां दर्ज की थीं। इनमें Form-6 में बदलाव, ECINet से जुड़े IT सिस्टम, चुनावी डेटा के केंद्रीकरण और पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से जुड़ी अपीलों जैसे मुद्दे शामिल थे।
चुनाव आयोग का क्या कहना है?
रिपोर्ट सामने आने के बाद चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों ने इन दावों पर अलग पक्ष रखा। आयोग के अनुसार SIR समेत उसके सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी और सर्वसम्मति से लिए गए हैं। इसलिए सामने आई लिखित आपत्तियों को फैसलों के खिलाफ दर्ज प्रक्रियागत या व्यक्तिगत मतभेद के तौर पर देखा जा रहा है, न कि किसी निर्णय के असंवैधानिक साबित होने के रूप में।
SIR को लेकर आने वाले समय में चुनाव आयोग, राजनीतिक दलों और अदालतों के बीच बहस जारी रहने की संभावना है। उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए मतदाता सूची में बदलाव का मुद्दा खास तौर पर महत्वपूर्ण बना हुआ है।