करीब 16 साल पहले मिडिल ईस्ट और उत्तरी अफ्रीका में शुरू हुए जन आंदोलनों ने दुनिया की राजनीति को हिलाकर रख दिया था। इसे ‘अरब स्प्रिंग’ नाम दिया गया। बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार और तानाशाही से परेशान लोग सड़कों पर उतरे और कई देशों में लंबे समय से सत्ता पर काबिज शासकों को पद छोड़ना पड़ा। लेकिन इन आंदोलनों के बाद हर देश में लोकतंत्र स्थापित नहीं हो सका। कहीं राजनीतिक बदलाव आया, तो कहीं गृहयुद्ध और अस्थिरता ने हालात बिगाड़ दिए।
क्या था अरब स्प्रिंग?
अरब स्प्रिंग की शुरुआत दिसंबर 2010 में ट्यूनीशिया से हुई। फल बेचने वाले मोहम्मद बूअजीजी ने स्थानीय अधिकारियों के कथित उत्पीड़न और अपमान के बाद खुद को आग लगा ली। इस घटना ने पहले से असंतुष्ट लोगों के गुस्से को आंदोलन में बदलने में अहम भूमिका निभाई।
देखते ही देखते विरोध प्रदर्शन मिस्र, लीबिया, यमन, सीरिया और बहरीन समेत कई देशों में फैल गए। लोगों की प्रमुख मांगें थीं—भ्रष्टाचार का अंत, राजनीतिक स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और जवाबदेह शासन।
तीन देशों में कैसे बदली सत्ता?
1. ट्यूनीशिया: व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बाद राष्ट्रपति जिने अल-आबिदीन बेन अली ने जनवरी 2011 में देश छोड़ दिया। उनकी करीब 23 साल पुरानी सत्ता समाप्त हो गई। शुरुआती राजनीतिक बदलावों के बावजूद देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था को बाद में गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
2. मिस्र: काहिरा के तहरीर स्क्वायर समेत कई जगह बड़े प्रदर्शन हुए। करीब 30 साल से सत्ता में रहे राष्ट्रपति होस्नी मुबारक ने 11 फरवरी 2011 को पद छोड़ दिया। हालांकि, इसके बाद भी देश में राजनीतिक संघर्ष जारी रहा और सेना की भूमिका अहम बनी रही।
3. लीबिया: मुअम्मर गद्दाफी के खिलाफ विद्रोह गृहयुद्ध में बदल गया। 2011 में नाटो के सैन्य हस्तक्षेप के बीच उनका शासन समाप्त हुआ। लेकिन गद्दाफी के बाद लीबिया लंबे समय तक राजनीतिक विभाजन, सशस्त्र संघर्ष और अस्थिरता से जूझता रहा।
सत्ता परिवर्तन और लोकतंत्र में क्या अंतर है?
अरब स्प्रिंग का सबसे बड़ा सबक यह है कि किसी सरकार का गिरना अपने आप लोकतंत्र की स्थापना नहीं करता। लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए स्वतंत्र संस्थाएं, निष्पक्ष चुनाव, कानून का शासन, जवाबदेह नेतृत्व और शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण जरूरी हैं।
जन आंदोलन बदलाव की शुरुआत कर सकते हैं, लेकिन उसके बाद देश को किस दिशा में ले जाया जाएगा, यह संस्थाओं और राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका पर भी निर्भर करता है।
आज भी क्यों प्रासंगिक है अरब स्प्रिंग?
अक्टूबर 2026 में अरब स्प्रिंग की चर्चा फिर तेज हुई है। सैम पित्रोदा द्वारा भारतीय युवाओं के आंदोलनों की तुलना अरब स्प्रिंग से किए जाने के संदर्भ में यह इतिहास महत्वपूर्ण हो जाता है। बांग्लादेश में 2024 के छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना की सरकार का पतन भी इस बहस को नया संदर्भ देता है।
हालांकि, अलग-अलग देशों के आंदोलनों की परिस्थितियां और नतीजे एक जैसे नहीं होते। अरब स्प्रिंग बताता है कि जनता का दबाव सत्ता बदल सकता है, लेकिन स्थायी लोकतांत्रिक बदलाव के लिए आंदोलन के बाद की संस्थागत और राजनीतिक प्रक्रिया बेहद अहम होती है।