दिल्ली में जर्जर और निर्माणाधीन इमारतों के ढहने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। पिछले करीब डेढ़ साल में सामने आए कई बड़े हादसों ने सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासन की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कहीं पुरानी इमारत भरभराकर गिरी, तो कहीं निर्माणाधीन बिल्डिंग का मलबा मजदूरों और आम लोगों की जान पर भारी पड़ा।
हालिया हादसे ने एक बार फिर राजधानी को झकझोर दिया। सत्य निकेतन इलाके में एक इमारत ढहने से कई लोग मलबे में दब गए और रेस्क्यू ऑपरेशन लंबे समय तक चलता रहा। यह इलाका दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए पीजी और किराए के कमरों के कारण जाना जाता है। ऐसे में हादसे ने उन परिवारों की चिंता बढ़ा दी है जो अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए दिल्ली भेजते हैं।
इससे पहले जुलाई 2026 में रोहिणी में निर्माणाधीन चार मंजिला इमारत गिरने से तीन मजदूरों की मौत हुई थी। 30 मई को सैदुलाजाब इलाके में पांच मंजिला इमारत गिरने से छह लोगों की जान चली गई थी।
2025 में भी दिल्ली में कई बड़े हादसे हुए। वेलकम इलाके में जर्जर इमारत गिरने, पहाड़गंज में निर्माणाधीन इमारत का बेसमेंट ढहने और मुस्तफाबाद में चार मंजिला इमारत गिरने से कई लोगों की मौत हुई।
इन घटनाओं के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर कोई इमारत जर्जर है या नियमों के खिलाफ निर्माण हुआ है, तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं होती? प्रशासन की निगरानी तब क्यों सक्रिय होती है, जब मलबे के नीचे जिंदगियां खत्म हो चुकी होती हैं? अब जरूरत सिर्फ जांच और मुआवजे की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था की है जो हादसा होने से पहले खतरे को पहचान सके।