Pakistan Yemen Policy: साल 2015 में यमन युद्ध में शामिल होने से इनकार करने वाला पाकिस्तान अब सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए सैन्य सहयोग बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के तहत पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने सामूहिक रक्षा व्यवस्था बनाई है। 5 अक्टूबर 2026 को तीनों देशों ने सऊदी अरब में सहमत सैन्य बलों और क्षमताओं की त्वरित तैनाती पर सहमति जताई।
2015 में पाकिस्तान ने क्यों कहा था 'हम नहीं लड़ेंगे'?
जब सऊदी अरब ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया था, तब रियाद ने पाकिस्तान से सैनिक, युद्धपोत और लड़ाकू विमान भेजने का अनुरोध किया था। लेकिन पाकिस्तान की संसद ने 10 अप्रैल 2015 को सर्वसम्मति से यमन संघर्ष में तटस्थ रहने का प्रस्ताव पारित किया। साथ ही यह भी कहा गया कि सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता या हरमैन शरीफैन को खतरा होने पर पाकिस्तान उसके साथ खड़ा होगा।
मक्का पैक्ट ने बदला पूरा समीकरण
7 अगस्त 2026 को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। समझौते के मुताबिक तीनों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला, तीनों पर हमला माना जाएगा। पाकिस्तान इसे रक्षात्मक और निवारक समझौता बताता है।
अब हूतियों के सऊदी क्षेत्र पर हमलों और यमन में बढ़ती लड़ाई के बीच यह समझौता पहली बड़ी सैन्य परीक्षा से गुजर रहा है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा है कि सऊदी अरब की रक्षा के लिए पाकिस्तान “हर संभव माध्यम” से समर्थन देगा, हालांकि उन्होंने यमन में पाकिस्तानी हवाई हमलों में सीधे शामिल होने की पुष्टि नहीं की है।
ईरान के साथ रिश्ते सबसे बड़ी चुनौती
पाकिस्तान के लिए यह कदम इसलिए संवेदनशील है क्योंकि उसकी पश्चिमी सीमा ईरान से लगती है और हूती आंदोलन को तेहरान का समर्थन प्राप्त है। हालांकि इस्लामाबाद ने ईरान के साथ बातचीत के रास्ते खुले रखने की बात भी कही है। ऐसे में पाकिस्तान को सऊदी सुरक्षा प्रतिबद्धताओं और ईरान के साथ अपने संबंधों के बीच संतुलन साधना होगा।
इस तरह 2015 की यमन में तटस्थता और 2026 की सऊदी सुरक्षा में सक्रिय भूमिका के बीच पाकिस्तान की नीति में बड़ा बदलाव दिखाई देता है। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि पाकिस्तानी बलों की भूमिका केवल सऊदी क्षेत्र की रक्षा तक सीमित रहेगी या यमन में सैन्य कार्रवाई तक भी जाएगी।